वार्षिक खेल उत्सव
रचनाकार: प्रेम सागर चौबे
शुरू हुआ अब खेलों का मेला,
देखो आया जाड़ा ठेला।
शीत पड़ी पर धूप खिली है,
मौसम भी मुसकान मिली है।
स्कूलों की फुलवारी न्यारी,
हो रही है खेल तैयारी।
कोर्ट बने हैं, पिच सँवरते,
रेफरी भी मंच पर आते—
हर कोने में हलचल जारी,
हो रही है खेल तैयारी।
चारों हाउस में बँटे हैं बच्चे,
टीचर भी हैं अच्छे-अच्छे।
सब समझाते, राह दिखाते,
कैसे होगी दावेदारी।
दाँव-पेंच के रंग दिखाकर
टीमें करती खूब तैयारी—
हो रही है खेल तैयारी।
पहले दो दिन चयन समय का,
तीसरा दिन सेमीफाइनल का।
चौथे दिन फिर फाइनल होगा,
उत्सव मन का आनन्द जगेगा।
खो-खो, चेस, कबड्डी आई,
कुर्सी-दौड़ भी सबको भाई।
दौड़ में जोश उफान रहेगा,
बच्चा-चीता बनकर दौड़ेगा।
फुटवाल की धूम अनोखी,
फ्रॉग-जंप की छाप भी रोचक।
चार दिवस की मस्ती छाई,
दिल ने खोल खुशी की खिड़की।
रिले रेस भी खूब जमेगी,
कभी-कभी तकरार भी होगी—
यही तो रंग है खेलों का भाई,
पुरस्कार के बाद मिलेगी बिदाई
